प्रेम के चले जाने की प्रतीक्षा
मैं एक अधीर लड़की हूं।कुछ दिन पहले ही आधी जिंदगी बीता दी है और आज … आधी रात।
कई दिनों से इस प्रतीक्षा में थी कि एक दिन कुछ लिखने बैठूंगी … कुछ अच्छा! पता नहीं क्या होता है वो…
आज का दिन अच्छा नहीं है, ना आज मैं अच्छी हूं। आंख फूल गए हैं, बहुत कम ही रोती हूं इतनी शिद्दत से।
लेकिन लिखने की प्रतीक्षा खत्म कर रही हूं आज। खुद के रोने पे काबू नहीं है, खुद के होने पे भी नहीं था। आज वो दिन है, जब मैं कहूंगी… न होना चुनती। चुनना बहुत अजीब चीज है, आप चुन लिए जाते हैं। लेकिन, आपके लिए चीजें चुन पाना मुश्किल होता है। मैं वैसी ही कमजोर लड़की हूं, जो कहीं भी चुन ली गई, अपनी इच्छा के बगैर भी। प्रेम, इसने भी मुझे ऐसे ही चुना। चुने जाने पे क्रोध नहीं है, लेकिन काबू ना होने पे है। अचानक प्रेम ने मुझे ऐसे घेरा की अंदर से बाहर तक मैं उससे भर गई, इस बात से मुझे कम ही शिकायत रही है, लेकिन आज वैसा दिन है जिस दिन मैं नहीं चाहती कि ऐसा रहे।
मैं चाहती हूं प्रेम से खाली हो जाऊं, मैं चाहती हूं भावना से शून्य हो जाऊं, और मेरे लिए चाहना ऐसा होता है कि बस अभी चाहा और अभी हो जाए। लेकिन प्रेम की ही तरह प्रतीक्षा ने भी मुझे हमेशा से चुना है, और बाकी चीजों की तरह इसपर भी मेरा कोई काबू नहीं है। आज मैं लिख रही हूं, लिखने की प्रतीक्षा खत्म करते हुए, ऐसा सोचती थी कि उस दिन खुद को सुख दूंगी जिस दिन लिखूंगी। लेकिन आज अच्छा दिन नहीं है, आज मैं खुश नहीं हूं, आज मुझे लिख कर अच्छा नहीं लगेगा, या पता नहीं। आज कोई मुझे पढ़े, सुने, कहे… तो भी शायद अच्छा नहीं लगेगा। मैं लिखने की प्रतीक्षा खत्म करते हुए एक दूसरी प्रतीक्षा शुरू कर रही हूं। मैने इसे नहीं चुना है, इसने मुझे चुना। मैने प्रेम को नहीं चुना है और मुझे आज के दिन इस बात से शिकायत है। मैं एक अधीर लड़की हूं, और जीवन जबरन मुझसे प्रतीक्षा करवाता है। मुझे इस बात का दुख है कि मुझे मेरे होने पर काबू क्यों नहीं था।


