बार बार वही
बार बार वही …
चलती जाती हूँ रोज रोज रोज, एक ही राह, जीवन बदलते रहने के नाम से ज्यादा मुझे हर रोज एक ही चीज़ दोहराते रहने का नाम लगता है | मुझे पूरी दुनिया कभी एक सी लगने लगती है, क्या अलग है समझ नहीं आता, हर जगह समानताएं, एक चीज़ से दूसरी चीज मिलाती रहती हूँ, एक बात से दूसरी बात, एक वजह से दूसरी वजह, एक मुद्दा से दूसरा मुद्दा, सबमे कुछ कुछ एक सा है | एक ही रास्ता है, एक ही घर, एक ही चेहरा है एक ही दिमाग, अलग तलाशने से शून्य मिलता है | अलग अलग जगह जाती हूँ, लोगों के चेहरे, उनके रंग, उनकी महक, उनकी आवाज़े उनके बात करने का ढंग, सब एक जैसा ही लगता है, अलग अलग जगह जाने से भी लगता है एक ही जगह पर चली गयी हूँ बार बार |
मुझे जिससे बार बार प्रेम होता है वो भी एक ही है, और बार बार उससे ही नफरत होती है, जलन, थकान सब उससे ही होती है, सुकून भी उससे ही आता है, आराम भी वहीँ ढूंढती हूँ | मुझे किसी नए की इच्छा ही नहीं है कभी, ये उसकी लिए डरावनी बात होनी चाहिए, होनी ही चाहिए | लेकिन मैं बार बार उसी के पास चली जाती हूँ, उसने मुझे रोकने के लिए कुछ नहीं किया…
मैं खुद की माँ बन चुकी हूँ, अपनी माँ से थोड़ी अलग, ऐसे मैं इंसान काफी अपनी माँ जैसी ही बनी हूँ, लेकिन अपने लिए जो माँ बनीं हूँ वो मेरी माँ से अलग है, यहाँ समानताएं असमानताएं एक साथ लटकती रहती हैं, अपने साथ साथ कईयों की माँ बनने जैसा महसूस करती हूँ, कभी कभी उसकी माँ भी बनने लगती हूँ, खूब दुलार से खाना खिलाने का मन होता है, थपकी देके सुलाने का भी मन होता है, माँ जैसे पैर हाथ दबा देने का भी मन हो जाता है, ये सब पित्रसत्ता से नफरत करते हुए मैं क्यूँ करना चाहती रहती हूँ मुझे पता नहीं | औरतों का प्रेम मातृत्व में लिपटा होता है |
मैं लिखती हूँ, बार बार वही सब, शब्द भी ज्यादातर एक से ही हैं, बातें भी, भाव भी सब एक सा, मेरी कलम को भी एक ही रास्ता मालूम है शायद ….. मुझे प्रेम में, काम में, घर में, बाहर, बाज़ार में, मेले में, पेड़ में, आसमान में, बादल में, तालाब में, मछली में, मेढक में, कूएं में, कचरे में, गधे के बच्चे में बार बार वही सब दोहराव दिखता है, मैं दोहराती रहती हूँ, अपने साथ बार बार एक ही त्रासदी, उसकी त्रासदी, मैं अलग थी, पर अब वही बन चुकी हूँ- मोनोलोगिया व्यक्ति, अपना कहा सो कहा, किसी का सुना नहीं |
उसके जैसी… हाँ उसके जैसे चक्र में मैं नहीं फस रही हूँ, (किसी और की त्रासदी से बर्बाद होकर किसी और को बर्बाद करने वाले चक्र) …. लेकिन मैं आदत में उसके जैसी बन चुकी हूँ, सहेलियों से दूर, काम की बातें, नीजी बातों को करने से बचना, सवालों को काट देना, इन सब में मैं और वो समान हो चुके हैं, लेकिन मैं तब भी थोड़ी ज्यादा इंसान हूँ, त्रासदी सहता हुआ इंसान अपने अन्दर से इंसानियत घटा लेता है, पता नहीं क्यूँ… इस तरीके से मेरे अन्दर सुनने की क्षमता घटी है, अब मैं क्या सुनुंगी, इसे चुन के आगे बढती हूँ | मैं मसलों की गंभीरता से ये तय करती हूँ कि मैं इसको सुन पाउंगी भी या नहीं, मुझे ज्यादा दुखी इंसान अपना दुःख सुनाये तो चलता है, मुझसे कम दुखी व्यक्ति का दुःख मुझे ड्रामा लगता है, वो मैं नहीं सुन पाती | इसे नापने के लिए मेरे पास कोई मीटर नही है लेकिन पता नहीं कैसे मापती हूँ | खुद से खुद को सुनाती हूँ, खुद ही सुनती हूँ… बस ये है |
मै अब भी इतनी कम इंसान नहीं बनी हूँ कि किसी के जीवन में जाऊं उसे अपने प्यार में पड़ने दूं, और कहूँ कि हम बस दोस्त हैं और ये बस इतना ही हो सकता है, और बार बार उसके पास जाती भी रहूँ, और बार बार उसके आने को अपना दरवाजा खुला भी रखूं, मुझे मेरे जैसे एक और इंसान पे बहुत दया आएगी, मैं ऐसा किसी के साथ नहीं कर सकती | मुझे लगता है मैं किसी को मजाक में भी अपना दोस्त मानूंगी तो उसे ऐसी किसी जगह पर नहीं छोडूंगी जहाँ मुझे सामने से उसका दिल टूटता दिख रहा हो, और मैं तो कभी वो व्यक्ति हो ही नहीं सकती जो अपने दोस्त का दिल भी तोड़े और दुःख भी न मनाये, इन मायनों में मुझे कहना ही पड़ेगा खुद को बेहतर इंसान, लेकिन बेहतर होने से मेरी त्रासदी और दुःख कम नहीं हो जाते, बल्कि वो बढ़ते ही हैं | उसकी जगह अगर मैं होती तो पहली ही बार में उसको मेरी ओर बढ़ने से रोक देती… उसे भी ऐसा ही करना चाहिए |
इंसान में भावनाओं की कद्र का बचा रहना बहुत जरुरी होता है, वरना लाश और आदमी में फर्क नही बचेगा | हर बार मैं अंत तलाशने को आती हूँ, मुझे नहीं मालूम किसी चीज़ का अंत कैसे किया जाता है, जैसे अभी मुझे नहीं पता मैं कब तक लिखती चली जाउंगी और इस लेख का अंत ही नहीं मिलेगा, मुझे नहीं पता मैं कबतक ऐसे ही प्रेम में पड़ी रहूँ और इस भाव का अंत मुझे कहाँ जाकर मिलेगा, मैं अपने हर लेख में लिखती रहती हूँ मुझे पता नहीं, मुझे नहीं समझ आता … मुझे इन बातों का भी अंत तलाशना है, मुझे इस लेख, भाव, दोहराव,त्रासदी, बर्बादी, जीवन, इच्छा, दुःख और बहुत कुछ का अंत तलाशना है|

